HI/710813b प्रवचन - श्रील प्रभुपाद लंडन में अपनी अमृतवाणी व्यक्त करते हैं

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HI/Hindi - श्रील प्रभुपाद की अमृत वाणी
"जैसे मैं कहता हूं: "मेरा सिर" या "मेरे बाल," लेकिन अगर मैं आपसे पूछूं या आप मुझसे पूछें कि, "कितने बाल हैं?" ओह, मैं अज्ञानी हूं-मुझे नहीं पता। इसी तरह, हम इतने अपूर्ण हैं कि हमें अपने शरीर का भी अल्प ज्ञान हो सकता है। हम खा रहे हैं, लेकिन खाद्य-पदार्थ किस तरह से स्राव में तब्दील हो रही है, कैसे वो खून बन रही है, कैसे वो ह्रदय से होकर जा रही है, और वो लाल हो जाती है, और फिर से सभी नसों में फैल जाती है, और इस तरह शरीर का पोषण हो रहा है, हमें अल्प ज्ञान है, लेकिन काम कैसे चल रहा है, यह कारखाना कैसे चल रहा है, कारखाना, मशीन कैसे काम कर रहा है, हमें बहुत कम ज्ञान है। परोक्ष रूप से हम जानते हैं कि, "यह मेरा शरीर है।" "अप्रत्यक्ष रूप से" का अर्थ है कि हमने सुना है, लेकिन हमें कोई प्रत्यक्ष ज्ञान नहीं है।"
710813 - प्रवचन उत्सव जन्माष्टमी प्रातः काल - लंडन