HI/Prabhupada 0177 - कृष्ण भावनामृत शाश्वत तथ्य है

Revision as of 17:39, 1 October 2020 by Elad (talk | contribs) (Text replacement - "(<!-- (BEGIN|END) NAVIGATION (.*?) -->\s*){2,15}" to "<!-- $2 NAVIGATION $3 -->")
(diff) ← Older revision | Latest revision (diff) | Newer revision → (diff)


Lecture on SB 1.15.28 -- Los Angeles, December 6, 1973

तो हमारा अंतरंग संबंध है । तो जब हम भगवान या कृष्ण के साथ अपने अंतरंग संबंध को समझने की स्थिति में आते हैं, उसे स्वरूप-सिद्धि कहा जाता है, स्वरूप-सिद्धि । स्वरूप-सिद्धि का अर्थ है पूर्णता की प्राप्ति, स्वरूप-सिद्धि । तो यहाँ सूत गोस्वामी कहते हैं सौहृदेन गधेन, संत । यदि एक पुराना मित्र एक और पुराने मित्र से मिलता है, तो वे बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । इसी तरह यदि पिता खोए ह्ए बालक से मिलता है, वह बहुत प्रसन्न हो जाता है और बालक भी प्रसन्न हो जाता है । जो पति, पत्नी अलग थे, जब वे फिर मिलते हैं । तो वे बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । यह बिल्कुल स्वाभाविक है । कई वर्षों के बाद जब स्वामी और सेवक फिर से मिलते हैं तो वे बहुत प्रसन्न हो जाते हैं । तो कृष्ण के साथ हमारा संबंध कई मायनों में है, शांत, दास्य, साख्य, वात्सल्य, माधुर्य । शांत, शांत का अर्थ है तटस्थ, केवल परम को समझना । दास्य का अर्थ है एक कदम आगे । जैसे हम कहते हैं, "ईश्वर महान है ।" यह शांत है, भगवान की महानता की सराहना करना । लेकिन कोई गतिविधि नहीं है । लेकिन जब आप एक कदम आगे चलते हैं, कि " भगवान महान है। तो मैं कई समाज, मित्रता, बिल्लियों, कुत्तों की सेवा कर रहा हूँ और कितनों को मैं प्यार कर रहा हूँ । क्यों न मैं सबसे परम को प्रेम करूँ ? इसे दास्य कहा जाता है ।

केवल भगवान की अनुभूति होना अच्छा है, यह भी बहुत अच्छा है । लेकिन आप जब स्वेच्छा से आगे जाएँगे, "अब क्यों न मेैं परम की सेवा करूँ ?" जैसे साधारण सेवा, जो लोग सेवा में लगे हुए हैं, वे निम्न सेवा से बेहतर सेवा के लिए बदलने की कोशिश करना चाहते हैं । सेवा तो है । लेकिन बेहतर सेवा है जब किसी को सरकारी नौकरी मिलती है । वह सोचता है कि यह बहुत अच्छा है । तो इसी तरह, जब हम सेवा करते हैं, जब हम परम की सेवा करने की इच्छा रखते हैं, यह हमें शांतिपूर्ण जीवन देगा । यह शांत, दास्य है । फिर मित्रता के साथ सेवा । सेवा, स्वामी और सेवक सेवा दे रहे हैं, लेकिन जब नौकर बहुत अंतरंग हो जाता है तब मित्रता हो जाती है । मैंने कलकत्ता में व्यवहारिक रूप से यह देखा है । डॉ. बोस, उनका वाहनचालक उनका सबसे अच्छा मित्र था । जब वे कार में बैठते थे, वह चालक के साथ अपने मन की सारी बातें करते थे ।

तो यह चालक, वह उनका घनिष्ठ मित्र बन गया । चालक के साथ सभी गोपनीय वार्ता । ऐसा होता है । सेवक बहुत गोपनीय हो जाता है, तो मालिक अपने मन की बातें बताता है । वह उसके साथ बात करता है कि उसे क्या करना है । तो यह मित्रता का स्तर कहा जाता है । और फिर और उन्नति... जैसा रिश्ता पिता और पुत्र, माँ और पुत्र । इसे वात्सल्य कहा जाता है, और अाखिर में दाम्पत्य प्रेम । इसलिए इस तरह से हम कृष्ण के साथ जुड़े हुए हैं, किसी भी तरह से । आदर में, दास्यता में, मित्रता में, पैतृक स्नेह के रूप में, या वैवाहिक प्रेमी के रूप में तो हमें उस को पुनर्स्थापना करनी होगी । और जैसे ही आप इनमें से किसी एक को पुनर्स्थापित करेंगे, घनिष्ठता, तो हम प्रसन्न हो जाते हैं, क्योंकि यह शाश्वत है । वही उदाहरण... उंगली, जब तक वह अलग है, वह प्रसन्न नहीं है । जैसे ही यह जुड़ती है वह प्रसन्न है । इसी तरह, कृष्ण के साथ हमारा शाश्वत संबंथ है । अभी हम अलग हैं, लेकिन जैसे ही हम उनके साथ जुड़ जाते हैं फिर से हम, येनात्मा सुप्रसीदति बन जाते हैं । इसलिए कृष्ण भावनामृत आंदोलन हर किसी के लिए लाभकारी है बस अपने मूल चेतना को पुनर्जीवित करने की कोशिश करें । वह पहले से ही है, नित्य-सिद्ध कृष्ण भक्ति । हमारी कृष्ण चेतना शाश्वत तथ्य है । अन्यथा आप यूरोपीय, अमरिकी लड़के और लड़कियों को, तीन या चार साल पहले, आपको कृष्ण क्या है यह नहीं पता था ।

आप कृष्ण से इतने आकृष्ट क्यों हैं ? आप क्यों आकृष्ट हैं ? जब तक आप कृष्ण से आकृष्ट नहीं हैं, आप अपने बहुमूल्य समय को इस मंदिर में या श्रीकृष्ण की महिमा के प्रचार के लिए नहीं लगा सकते । आपने कृष्ण के प्रति प्रेम विकसित किया है । अन्यथा कोई भी मूर्ख नहीं है कि वह समय बर्बाद करे । नहीं । यह कैसे संभव है? कोई कह सकता है कि कृष्ण भारतीय हैं, कृष्ण हिंदू हैं । तो ईसाई क्यों रुचि रखते हैं ? क्या वे हिंदू हैं ? नहीं । कृष्ण न तो हिंदू है और न ही मुसलमान और न ही ईसाई । कृष्ण कृष्ण हैं । और आप कृष्ण के अभिन्न अंग हो । यह समझ, "मैं हिन्दू हूँ", "मैं मुसलमान हूँ", "मैं ईसाई हूँ", "मैं अमरिकी हूँ", "मैं भारतीय हूँ", ये सभी उपाधिया हैं । असल में मैं आत्मा हूँ, अहम् ब्रह्मास्मि । और कृष्ण परम ब्रह्मन् हैं, परम ब्रह्म परम धाम पवित्रम परमम भवान् (भगी १०.१२) ।

तो हमारा कृष्ण के साथ अंतरंग संबंध है । यही नित्य तथ्य है । बस हमें पुनर्स्थापना करनी है । श्रवणादि- शूद्ध-चित्ते करये उदय । हमें बनाना होगा । वैसे ही जैसे एक नवयुवक नवयुवती से प्रेम करना पसंद करता है और नवयुवती एक नवयुवक से प्रेम करना पसंद करती है । यह स्वाभाविक है । यह स्वाभाविक है । लेकिन जब वे मिलते हैं, यह पुनर्स्थापित होता है । ऐसा नहीं है कि कुछ नया स्थापित होता है । यह है । लेकिन संयोग से या वैसे भी, जब वे संपर्क में अाते हैं, प्रेम की प्रवृत्ति बढ़ जाती है । प्रेम बढ़ता है । तो कृष्ण के साथ हमारा संबंध स्वाभाविक है । यह अस्वाभाविक नहीं है । नित्य-सिद्ध । नित्य-सिद्ध का अर्थ है यह शाश्वत तथ्य है । बस यह ढ़क गया है । यह ढ़का हुअा है। इस आवरण को हटाना होगा । तब हम तुरंत श्रीकृष्ण के साथ संबंध में हैं, प्राकृतिक रुप से । यही कृष्णभावनामृत की पूर्णता है ।