HI/BG 12.6-7

His Divine Grace A.C. Bhaktivedanta Swami Prabhupāda


श्लोकस 6-7

ये तु सर्वाणि कर्माणि मयि संन्यस्य मत्परः ।
अनन्येनैव योगेन मां ध्यायन्त उपासते ॥६॥
तेषामहं समुद्धर्ता मृत्युसंसारसागरात् ।
भवामि नचिरात्पार्थ मय्यावेशितचेतसाम् ॥७॥

शब्दार्थ

ये—जो; तु—लेकिन; सर्वाणि—समस्त; कर्माणि—कर्मों को; मयि—मुझमें; सन्न्यस्य—त्याग कर; मत्-परा:—मुझमें आसक्त; अनन्येन—अनन्य; एव—निश्चय ही; योगेन—ऐसे भक्तियोग के अभ्यास से; माम्—मुझको; ध्यायन्त:—ध्यान करते हुए; उपासते—पूजा करते हैं; तेषाम्—उनका; अहम्—मैं; समुद्धर्ता—उद्धारक; मृत्यु—मृत्यु के; संसार—संसार रूपी; सागरात्—समुद्र से; भवामि—होता हूँ; न—नहीं; चिरात्—दीर्घकाल के बाद; पार्थ—हे पृथापुत्र; मयि—मुझ पर; आवेशित—स्थिर; चेतसाम्—मन वालों को।

अनुवाद

जो अपने सारे कार्यों को मुझमें अर्पित करकेतथा अविचलित भाव से मेरी भक्ति करते हुए मेरी पूजा करते हैं और अपनेचित्तों को मुझ पर स्थिर करके निरन्तर मेरा ध्यान करते हैं, उनके लिए हेपार्थ! मैं जन्म-मृत्यु के सागर से शीघ्र उद्धार करने वाला हूँ |

तात्पर्य

यहाँ पर स्पष्ट कहा गया है कि भक्तजन अत्यन्त भाग्यशाली हैं किभगवान् उनका इस भवसागर से तुरन्त ही उद्धार कर देते हैं | शुद्ध भक्ति करनेपर मनुष्य को इसकी अनुभूति होने लगती है कि ईश्र्वर महान हैं और जीवात्माउनके अधीन है | उसका कर्त्तव्य है कि वह भगवान् की सेवा करे और यदि वह ऐसानहीं करता, तो उसे माया की सेवा करनी होगी |

जैसा पहले कहा जाचुका है कि केवल भक्ति से परमेश्र्वर को जाना जा सकता है | अतएव मनुष्य कोचाहिए कि वह पूर्ण रूप से भक्त बने | भगवान् को प्राप्त करने के लिए वहअपने मन को कृष्ण में पूर्णतया एकाग्र करे | वह कृष्ण के लिए ही कर्म करे | चाहे वह जो भी कर्म करे लेकिन वह कर्म केवल कृष्ण के लिए होना चाहिए | भक्ति का यही आदर्श है | भक्त भगवान् को प्रसन्न करने के अतिरिक्त और कुछभी नहीं चाहता | उसके जीवन का उद्देश्य कृष्ण को प्रसन्न करना होता है औरकृष्ण की तुष्टि के लिए वह सब कुछ उत्सर्ग कर सकता है जिस प्रकार अर्जुन नेकुरुक्षेत्र के युद्ध में किया था | यह विधि अत्यन्त सरल है | मनुष्य अपनेकार्य में लगा रह कर हरे कृष्ण महामन्त्र का कीर्तन कर सकता है | ऐसेदिव्य कीर्तन से भक्त भगवान् के प्रति आकृष्ट हो जाता है |

यहाँपर भगवान् वचन देते हैं कि वे ऐसे शुद्ध भक्त को तुरन्त ही भवसागर सेउद्धार कर देंगे | जो योगाभ्यास में बढ़े चढ़े हैं, वे योग द्वारा अपनी आत्माको इच्छानुसार किसी भी लोक में ले जा सकते हैं और अन्य लोग इस अवसर कोविभिन्न प्रकार से उपयोग में लाते हैं, लेकिन जहाँ तक भक्त का सम्बन्ध है, उसके लिए यहाँ यह स्पष्ट कहा गया है कि स्वयं भगवान् ही उसे ले जाते हैं | भक्त को वैकुण्ठ में जाने के पूर्व अनुभवी बनने के लिए प्रतीक्षा नहीं करनीपड़ती | वराह पुराण में एक श्लोक आया है –

नयामि परमं स्थानमर्चिरादिगतिं विना |

गरुडस्कन्धमारोप्य यथेच्छमनिवारितः ||

तात्पर्य यह है कि वैकुण्ठलोक में आत्मा को ले जाने के लिए भक्त कोअष्टांगयोग साधने की आवश्यकता नहीं है | इसका भार भगवान् स्वयं अपने ऊपरलेते हैं | वे यहाँ पर स्पष्ट कर रहे हैं कि वे स्वयं ही उद्धारक बनते हैं | बालक अपने माता-पिता द्वारा अपने आप रक्षित होता रहता है, जिससे उसकीस्थिति सुरक्षित रहती है | इसी प्रकार भक्त को योगाभ्यास द्वारा अन्य लोकोंमें जाने के लिए प्रयत्न करने की आवश्यकता नहीं होती, अपितु भगवान् अपनेअनुग्रहवश स्वयं ही अपने पक्षीवाहन गरुड़ पर सवार होकर तुरन्त आते हैं औरभक्त को भवसागर से उबार लेते हैं | कोई कितना ही कुशल तैराक क्यों न हो, औरकितना ही प्रयत्न क्यों न करे, किन्तु समुद्र में गिर जाने पर वह अपने कोनहीं बचा सकता | किन्तु यदि कोई आकर उसे जल से बाहर निकाल ले, तो वह आसानीसे बच जाता है | इसी प्रकार भगवान् भक्त को इस भवसागर से निकाल लेते हैं | मनुष्य को केवल कृष्णभावनामृत की सुगम विधि का अभ्यास करना होता है , औरअपने आपको अनन्य भक्तिमें प्रवृत्त करना होता है | किसी भी बुद्धिमानव्यक्ति को चाहिए कि वह अन्य समस्त मार्गों की अपेक्षा भक्तियोग को चुने |

नारायणीय में इसकी पुष्टि इस प्रकार हुई है-

या वै साधनसम्पत्तिः पुरुषार्थचतुष्टये |

तया विना तदाप्नोति नरो नारायणाश्रयः ||

इस श्लोक का भावार्थ यह है कि मनुष्य को चाहिए कि वह न तो सकाम कर्म कीविभिन्न विधियों में उलझे, न ही कोरे चिन्तन से ज्ञान का अनुशीलन करे | जोपरम भगवान् की भक्ति में लीन है, वह उन समस्त लक्ष्यों को प्राप्त करता हैजो अन्य योग विधियों, चिन्तन, अनुष्ठानों, यज्ञों, दानपुण्यों आदि सेप्राप्त होने वाले हैं | भक्ति का यही विशेष वरदान है |

केवलकृष्ण के पवित्र नाम – हरे कृष्ण, हरे कृष्ण, कृष्ण कृष्ण, हरे हरे, हरेराम, हरे राम, राम राम, हरे हरे – का कीर्तन करने से ही भक्त सरलता तथासुखपूर्वक परम धाम को पहुँच सकता है | लेकिन इस धाम को अन्य किसी धार्मिकविधि द्वारा प्राप्त नहीं किया जा सकता |

भगवद्गीता का निष्कर्ष अठारहवें अध्याय में इस प्रकार व्यक्त हुआ है –

सर्वधर्मान् परित्यज्य मामेकं शरणं व्रज |

अहम् त्वां सर्वपापेभ्यो मोक्षयिष्यामि मा शुचः ||

आत्म-साक्षात्कार की अन्य समस्त विधियों को त्याग कर केवल कृष्णभावनामृतमें भक्ति सम्पन्न करनी चाहिए | इससे जीवन की चरम सिद्धि प्राप्त की जासकती है | मनुष्य को अपने गत जीवन के पाप कर्मों पर विचार करने की आवश्यकतानहीं रह जाती, क्योंकि उसका उत्तरदायित्व भगवान् अपने ऊपर ले लेते हैं | अतएव मनुष्य को व्यर्थ ही आध्यात्मिक अनुभूति में अपने उद्धार का प्रयत्ननहीं करना चाहिए | प्रत्येक व्यक्ति को चाहिए कि वह परम शक्तिमान ईश्र्वरकृष्ण की शरण ग्रहण करे | यही जीवन की सर्वोच्च सिद्धि है |