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HI/Prabhupada 0044 - सेवा का अर्थ है तुम गुरु के आदेश का अनुसरण करो

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सेवा का अर्थ है तुम गुरु के आदेश का अनुसरण करो
- Prabhupāda 0044


Lecture on BG 4.1 -- Montreal, August 24, 1968

तो इसका मतलब है कि वह कृष्णके अादेशोंका अनुसरण कर रहा है । बस । उसे परवाह नहीं है कि, "मैं कृष्णका दुश्मन बनने जा रहा हूँ ।" सिद्धांत यह है कि वह अनुसरण कर रहा है । अगर कृष्ण कहते हैं कि "तुम मेरा दुश्मन बन जाअो," तो मैं उनका दुश्मन बन जाऊँगा । यही भक्तियोग है । हां । मैं कृष्णको संतुष्ट करना चाहता हूँ । बिलकुल एक मालिककी तरह जो नौकर को कहता है कि "तुम मुझे यहाँ मारो ।" तो वह मारता है । तो यह सेवा है । लोग इसे एसे देख सकते हैं "अोह, वह मार रहा है अौर सोच रहा है कि "मैं सेवा कर रहा हूं ? यह क्या है ? वह मार रहा है ।" लेकिन मालिक यह चाहता है "तुम मुझे मारो ।" यही सेवा है । सेवा का अर्थ है तुम स्वामीके आदेश का अनुसरण करो । यह फर्क नहीं पड़ता की वो सेवा क्या है । भगवान चैतन्यके जीवनमें बहुत अच्छा उदाहरण है, कि उनका व्यक्तिगत सेवक गोविंद था ।

तो भगवान चैतन्यके प्रसाद ग्रहण करनेके बाद, तब गोविंद प्रसाद ग्रहण करता । तो एक दिन, भगवान चैतन्य, प्रसाद लेनेके बाद, वह दहलीज़ पर लेटे हुए थे । क्या कहते हैं? थ्रेशहोल्ड ? दरवाजा ? द्वार । तो गोविंद उन्हे पार कर गया । गोविंद उनके पैरोंकी मालिश करता था जब वे आराम करते थे । तो गोविंद भगवान चैतन्यको पार कर गया और उनके पैरोंकी मालिश करने लगा । तब भगवान चैतन्य सो गए थे, और मान लो, आधे घंटे के बाद, जब वे उठे तब उन्होंने देखा, "गोविंद, तुमने अभी तक अपना प्रसाद नहीं लिया है ?" "नहीं, श्रीमान ।" "क्यों ?" "मैं आप को पार नहीं कर सकता हूँ । आप यहाँ लेटे हुए हैं ।" "तो फिर तुम अंदर कैसे आए ?" "मैं अापके उपर से आया था ।" "तो पहले तुम मेरे उपरसे गए, तो क्यों फिर से पार नहीं किया ?" "पहले मैं आप की सेवा करनेके लिए आया था । और अब मैं प्रसादम लेने के लिए अापको पार नहीं कर सकता हूँ । यह मेरा कर्तव्य नहीं है । वह मेरे खुद के लिए होता । और यह आप के लिए है ।" तो कृष्णकी प्रसन्नता के लिए तुम उनके दुश्मन बन सकते हो, तुम उनके दोस्त बन सकते हो, तुम कुछ भी बन सकते हो । यही भक्तियोग है । क्योंकि तुम्हारा उद्देश्य कृष्णको संतुष्ट करना है । और जैसे ही तुम अपनी इन्द्रियोंको प्रसन्न करना चाहते हो, तो तुम इस भौतिक दुनियामें अा जाते हो, तुरंत ।

कृष्ण बहिरमुख हया भोग वांछा करे
निकट-स्थ माया तारे जापटिया धरे
(प्रेम विवर्त)

जैसे ही हम कृष्ण को भूल जाते हैं और अपने खुदकी इन्द्रिय संतुष्टि के लिए काम करना चाहते हैं, यह माया है । और जैसे ही हम इन्द्रिय संतुष्टिकी इस प्रक्रिया को त्याग देते हैं और सब कुछ कृष्णके लिए करते हैं, तो यह मुक्ति है ।