HI/Prabhupada 0227 - क्यों मर रहे हो। मैं मरना नहीं चाहता

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क्यों मर रहे हो? मैं मरना नहीं चाहता - Prabhupāda 0227


Lecture -- Los Angeles, May 18, 1972

तो कृष्ण को समझना थोड़ा मुश्किल है । दरअसल, भगवान को समझना एक एसा विषय है जो बहुत मुश्किल है । लेकिन खुद भगवान भगवद गीता में खुद को समझा रहे हैं । "मैं एसा हूँ । मैं एसा हूँ, यह भौतिक प्रकृति इस तरह से है, यह आध्यात्मिक प्रकृति इस तरह से है, जीव इस तरह हैं ..." सब कुछ पूरी तरह से भगवद गीता में वर्णित है । खुद भगवान, अपना ज्ञान दे रहे हैं और भगवान को समझने के लिए यही एक प्रक्रिया है । अन्यथा, अटकलों से हम भगवान को नहीं समझ सकते हं । यह संभव नहीं है । वह असीमित हैं और हम सीमित हैं । हमारा ज्ञान, हमारी धारणा, सभी बहुत सीमित है । तो हम कैसे असीमित को समझ सकते हैं? लेकिन अगर हम असीमित के संस्करण को स्वीकार करते हैं, कि वे इस तरह से हैं, ऐसा है, तो हम समझ सकते हैं । यह एकदम सही ज्ञान है । भगवान के काल्पनिक ज्ञान का कोई मूल्य नहीं है ।

वास्तविक ज्ञान, जैसे ... मैंने यह उदाहरण दिया । जैसे एक लड़का जानना चाहता है कि उसका पिता कौन है, उसका पिता कौन है, साधारण सी बात है कि माँ से पूछना । या माँ बताती है, "ये तुम्हारे पिता हैं ।" यही सही ज्ञान है । अौर अगर तुम कल्पना करते हो, "कौन मेरे पिता हैं?" और पूरे शहर को पूछते हो, "आप मेरे पिता हैं? क्या आप मेरे पिता हैं? आप मेरे पिता हैं?" यह ज्ञान हमेशा अपूर्ण ही रहेगा । वह कभी नहीं पता लगा पाएगा कि उसके पिता कौन हैं । लेकिन यह सरल प्रक्रिया, अगर वह अपने पिता से ज्ञान लेता है, अधिकारी, माता, "मेरे प्रिय लड़के, यहाँ तुम्हारे पिता हैं," तो तुम्हारा ज्ञान परिपूर्ण है । इसी तरह, दिव्य ज्ञान ... वैसे ही जैसे मैं बोल रहा था कि एक आध्यात्मिक दुनिया है । यह हमारे अटकलों का विषय नहीं है । लेकिन जब भगवान कहते हैं, "हाँ, एक आध्यात्मिक दुनिया है, वह मेरा मुख्यालय है," यह सब ठीक है । हां ।

तो हम कृष्ण से ज्ञान प्राप्त करते हैं, सबसे अधिकृत व्यक्ति । इसलिए हमारा ज्ञान परिपूर्ण है । हम पूर्ण नहीं हैं, लेकिन हमारा ज्ञान परिपूर्ण है । क्योंकि हम ज्ञान प्राप्त करते हैं पूर्ण व्यकति से । वही उदाहरण, कि मेरी समझ सही नहीं है कि मेरे पिता कौन हैं, लेकिन मेरी मां सही है, अौर क्योंकि मैं मेरी माँ से पूर्ण ज्ञान स्वीकार करता हूँ, इसलिए पिता के बारे में मेरी जानकारी सही है । तो यह कृष्ण भावनामृत आंदोलन मानव समाज को सही ज्ञान देने के लिए है: वे क्या हैं, भगवान क्या हैं, यह भौतिक दुनिया क्या है, तुम यहॉ क्यों अाए हो, क्यों इतना क्लेश सह रहे हो, जीवन की दयनीय हालत से गुजर रहे हो, क्यों मर रहे हो । मैं मरना नहीं चाहता, लेकिन मृत्यु अनिवार्य है । मैं बूढ़ा आदमी बनना नहीं चाहता, लेकिन फिर भी यह अनिवार्य है । मैं रोग से पीड़ित होना नहीं चाहता हूँ, लेकिन यह अनिवार्य है । इनका, इनका हल निकालना ज़रूरी है । यह वास्तव में मानव जीवन की समस्याऍ हैं ।

ऐसा नहीं है कि, सोने, संभोग, खाने और बचाव की विधि में सुधार करना । यह मानव जीवन नहीं है । एक आदमी सोता है, कुत्ता भी सोता है । तो क्योंकि एक आदमी एक बहुत अच्छे अपार्टमेंट में सोता है इसका मतलब यह नहीं है कि वह कुत्ते से अधिक उन्नत है । काम तो सोना है । बस । क्योंकि आदमी नें रक्षा के लिए परमाणु हथियार की खोज की है, और कुत्ते के अपने नाखून और दांत हैं ... वह भी बचाव कर सकता है । तो बचाव है । तुम नहीं कह सकते कि, "क्योंकि मेरे पास यह परमाणु बम है इसलिए मैं पूरी दुनिया को या पूरे ब्रह्मांड को जीत सकता हूँ ।" यह संभव नहीं है । तुम अपने तरीके से बचाव कर सकते हो, और कुत्ता भी अपने तरीके से बचाव कर सकता है । तो खाने की एक भव्य विधि, बचाव की एक भव्य विधि, सोने की एक भव्य विधि, और मैथुन जीवन की एक भव्य विधि, एक देश या एक व्यक्ति को उन्नत नहीं कर सकता है । यह उन्नति नहीं है । यह एक ही बात नहीं है । मात्रा में, दो हजार पर पांच, या पांच, दो हजार पर पांच सौ, और बीस पर पांच, वही अनुपात । इसलिए, पशु गुण एक अच्छी तरीके से, एक वैज्ञानिक तरीके से, इसका मतलब यह नहीं है कि मानव समाज उन्नत है । यही अच्छी हैवानियत कही जा सकती है । बस । वास्तविक उन्नति का मतलब है भगवान को जानना । यही प्रगति है ।