HI/Prabhupada 1033 - यीशु मसीह भगवान के पुत्र हैं, भगवान के श्रेष्ठ पुत्र, तो उनके प्रति हमें पूरा सम्मान है

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यीशु मसीह भगवान के पुत्र हैं, भगवान के श्रेष्ठ पुत्र, तो उनके प्रति हमें पूरा सम्मान है
- Prabhupāda 1033


740628 - Lecture at St. Pascal's Franciscan Seminary - Melbourne

अतिथि (३): श्रीमान अाप यीशु मसीह को कैसे देखते हैं ?

प्रभुपाद: हम्म ?

मधुद्विष: प्रभु यीशु मसीह के बारे में हमारा दृष्टिकोण क्या है ?

प्रभुपाद: यीशु मसीह, प्रभु यीशु मसीह हैं, ... वे भगवान के पुत्र हैं, भगवान का सबसे सर्वश्रेष्ठ पुत्र, तो उनके प्रति हमें पूरा सम्मान है । हाँ । जो कोई भी भगवद भावनामृत का प्रचार करता है, वह हमारे लिए सम्मानीय है । इससे फर्क नहीं पड़ता कि कौन सा देश, कौन से वातावरण में, वह प्रचार कर रहा है । कोई फर्क नहीं पड़ता ।

मधुद्विष: हाँ, श्रीमान ?

अतिथि (४): असीसी के सेंट फ्रांसिस नें स्थापना की हमारी (अस्पष्ट) सिद्धांत (अस्पष्ट), पदार्थ का उपयोग करने के लिए भगवान के लिए, और सेंट फ्रांसिस बात करते थे "भाई कुत्ता" और "बहन बिल्ली" और "बहन पानी" और "भाई पवन ।" श्रीमान अाप क्या सोचते हैं सेंट फ्रांसिस के दृष्टिकोण और सिद्धांत के बारे में ?

मधुद्विष: (प्रश्न को दोहराते हुए) सेंट फ्रांसिस, इस पंथ के स्थापक जहॉ पर अापको बुलाया गया है प्रवचन के लिए, नें भगवान को पाया भौतिक संसार में । और वे, "भाई" और "बहन" कहकर संबोधित करते थे भौतिक चीजों को । "भाई पेड़," "बहन पानी," इस तरह । अापकी उसके बारे में क्या राय है ?

प्रभुपाद: यह असली भगवद भावनामृत है । यही असली भगवद भावनामृत है, हॉ, यह नहीं कि "मैं भगवद भावनाभावित हूँ, और मैं जानवरों को मारता हूं ।" यह भगवद भावना नहीं है । भाई के रूप में, पेड़, पौधे, निचली योनी के जानवर, यहां तक ​​कि तुच्छ चींटियों को भी स्वीकार करना... सम: सर्वेषय भूतेषु । यही भगवद गीता में समझाया गया है । ब्रह्म भूत: प्रसन्नात्मा न शोचति न कांक्षति सम: सर्वेषु भुतेषु (भ.गी. १८.५४) । सम: । सम: का अर्थ है सभी जीवों के प्रति समता, अात्मा देखना, हर किसी में... इससे कोई फर्क नहीं पड़ता कि वह आदमी या बिल्ली या कुत्ता या पेड़ या चींटी या कीट या बड़ा आदमी है । वे सभी भगवान के अंशस्वरूप हैं । वे केवल अलग वस्त्र मे हैं । किसी को एक पेड़ का वस्त्र मिला है; किसी को राजा का वस्त्र; किसी को कीट का । वह भी भगवद गीता में समझाया गया है। पंडिता: सम दर्शिन: ( भ.गी. ५.१८): "जो पंडित है, विद्वान, उसकी दृष्टि सम है ।" तो अगर सेंट फ्रांसिस एसा सोचते थे, तो यह आध्यात्मिक समझ का उच्चतम स्तर है ।