HI/Prabhupada 0377 - भजहू रे मन का तात्पर्य

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Purport to Bhajahu Re Mana -- Los Angeles, May 27, 1972

तो यह गीत गोविन्द दास द्वारा गाया गया था । गोविंद-दास-अभिलास रे । उनकी इच्छा क्या है? अभिलास का मतलब है इच्छा । भजहू रे मन श्री-नंद-नंदन: "मेरे प्रिय मन ..." क्योंकि मन हमारा दोस्त और दुश्मन है । अगर तुम अपने मन को प्रशिक्षित करते हो, तो मन तुम्हारा सबसे अच्छा दोस्त है । अौर अगर तुम अपने मन को प्रशिक्षित नहीं कर सकते हो, तो तुम्हारा सबसे बडा दुश्मन । स वै मन: कृष्ण पदारविन्दयो: (श्रीमद भागवतम ९.४.१८) | इसलिए मन को हमेशा कृष्ण के चरण कमलों में लगे रहना चाहिए, फिर मन स्वत: ही नियंत्रित हो जाएगा और दोस्त बन जाएगा । तो गोविंद दास अपनी इच्छा व्यक्त कर रहे हैं: "मेरे प्रिय मन, तुम सिर्फ नंद-नंदन की भक्ति सेवा में लगे रहो ।" वे ... वे कृष्ण नहीं कहते हैं । वे नंद-नंदन कहते हैं । भजहू रे मन श्री-नंद-नंदन । अगर हम सीधे कृष्ण को संबोधित करते हैं, यह बहुत भाता नहीं है, लेकिन अगर हम कहते हैं कृष्ण: नंद-नंदन, यशोदा-नंदन, देवकी-नंदन, पार्थ-सारथी - उनके भक्त के संबंध में - तो वे अधिक प्रसन्न हो जाते हैं । तो भजहू रे मन श्री-नंद-नंदन । क्यों श्री नंद-नंदन ? अब, अभय-चरणारविन्द रे । अगर तुम कृष्ण, नंद-नंदन, के चरणकमलों का आश्रय लेते हो, तो तुम्हे और चिंता नहीं होगी, भय नहीं होगा।

समाश्रिता ये पाद-पल्लव-प्लवम
महत-पदम पुण्य-यशो मुरारे:
भवाम्बुधिर वत्स-पदम परम पदम
पदम पदम पदम यद विपदाम न तेशाम
(श्रीमद भागवतम १०.१४.५८) |

यह भगवत-दर्शन है । पदम पदम यद विपदाम । यह भौतिक जगत, पदम पदम का मतलब है कदम कदम पर खतरा है । तो जो कृष्ण के चरण कमल की शरण लेता है, महत-पदम पुण्य-यशो मुरारे: समाश्रिता । उसके लिए कोई खतरा नहीं है । अभय-चरणारविन्द रे । कैसे कृष्ण की पूरी शरण लेना संभव है, जो निर्भयता है, कोई चिंता नहीं है, वैकुण्ठ ? दुर्लभ मानव-जनम सत-संगे । यह संभव है अगर तुम भक्तों का संग करते हो । अगर तुम सोचते हो की, "अब मैं बहुत ज्यादा उन्नत हो गया हूँ । अब मैं अकेला रहूँगा, और हरे कृष्ण का जाप करूँगा, हरिदास ठाकुर की नकल करके, तो यह बकवास है । तुम हरिदास ठाकुर की नकल नहीं कर सकते । तुम्हे भक्तों के साथ संग करना होगा । दुर्लभ मानग-जनम सत-संगे । सत-संगे । सताम प्रसंगान मम वीर्य संविदो (श्रीमद भागवतम ३.२५.२५) ।

अगर तुम भक्तों के साथ रहते हो, तो फिर उनके संघ द्वारा, उनके साथ बात करके, तुम्हे भगवद भावनामृत की असली समझ मिलेगी । यह समझने के लिए बहुत व्यावहारिक है । जैसे भौतिक संसार में कई संगठन, समितियॉ हैं । व्यवसायियों के, उनका शेयर बाजार संघ है, जो शेयर बाजार में काम कर रहे हैं । उनका संघ है । वे वहाँ जाते हैं, और उनकी व्यापार सुविधा बहुत अच्छी है । इसी तरह, इतने सारे क्लब । अगर तुम पीना चाहते हो और इन्द्रियों का आनंद चाहते हो, तो तुम कई क्लबों में जाते हो और उनके साथ संग करते हो और तुम पीना सीख जाअोगे, कैसे बहुत अच्छी तरह से यौन जीवन का आनंद लेना । इसलिए संग बहुत महत्वपूर्ण है । इसलिए, हमारा कृष्ण भावनामृत समाज, हम मौका दे रहे हैं लोगों को हमारे साथ संग करने के लिए । ताकि वह समझ सके कि कृष्ण क्या हैं, कृष्ण भावनामृत क्या है ।

इसलिए गोविंद दास सलाह देते हैं , दुर्लभ मानव जनम सत-संगे | मानव । यह मानव जीवन बहुत मुश्किल से प्राप्त होता है, दुर्लभ । कुत्तों का संघ नहीं, कौवे का संघ नहीं, लेकिन हंसों का संघ । संघ प्रकृति में भी हैं । "एक ही तरह के पक्षी एक साथ झुंड में रहते हैं ।" कौवे, वे कौवे के साथ संघ करेंगे, और हंस हंसों के साथ । श्वेत हंस, बहुत अच्छा पानी, अच्छा बगीचा, उन्हे यह पसंद है । कौवे को वो पसंद नहीं होगा । कौवे को कूडा दान पसंद है । वे वहाँ अानन्द पाते हैं । तो इसी तरह, प्रकृति की गुणवत्ता के अनुसार, मानव समाज में विभिन्न संघ हैं । लेकिन यह सलाह दी जाती है कि दुर्लभ मानव सत-संगे: कौवे के साथ नहीं, लेकिन हंसों के साथ । तुम हंस को दूध और पानी दो, वह दूध का भाग लेगा और पानी भाग को छोड़ देगा । इसी प्रकार एक हंस, एक हंस, परमहंस, इस मनुष्य जीवन में, जो जीवन के आध्यात्मिक भाग को लेता है और जीवन के भौतिक हिस्से को त्यागा देता है, उसे हंस कहा जाता है, परमहंस ।

हम मिश्रित हैं । हमारा शरीर भौतिक है, लेकिन मैं आत्मा हूं । तो हमें तकनीक पता होना चाहिए कि इस भौतिक बंधन से कैसे बाहर निकलें । यह इस भौतिक शरीर से बाहर आएगा, लेकिन जब वह बाहर आता है, तो यह भौतिक शरीर नष्ट होगा । बहुत अच्छा, अच्छा उदाहरण । आग है, लकड़ी में आग है, हर कोई जानता है । तो तुम आग लगाअो, और अगर तुम उश्रे शुष्क बनाते हो, तो आग बहुत जल्दी पकडता है । अौर जब आग धधकता है तब लकड़ी नहीं रहती है । लकड़ी का कोई अस्तित्व नहीं रहता है । इसी तरह, अगर हम अपने आध्यात्मिक चेतना का आह्वान करते हैं, कृष्ण भावनामृत का, जब यह बहुत अच्छी तरह से चल रहा है, तो तुम्हारा भौतिक अस्तित्व समाप्त हो जाएगा । यह प्रक्रिया है । दुर्लभ मानव जनम सत संगे तरह ए भव सिंधु रे ।

इस तरह, सिर्फ अज्ञान के इस महासागर के दूसरी अोर चले जाअो । फिर, कोई कह सकता है कि "अगर मैं कृष्ण भावनामृत आंदोलन के साथ संबद्ध रखूँ, तो कैसे मेरे परिवार के मामले चलेंगे ? कौन मेरी पत्नी और बच्चों को संभालेगा, समाज, दोस्ती, प्यार को? मेरे इतने सारे व्यापार हैं । " वहाँ, इसलिए वे कहते हैं, शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे: "मेरे प्रिय मन, तुम इतनी मेहनत से काम कर रहे हो ।" शीत अातप । "कड़ाके की ठंड में तुम काम करने के लिए जा रहे हो । चिलचिलाती गर्मी में तुम काम करने के लिए जा रहे हो । तेज़ बारिश में तुम अपना काम बंद नहीं कर सकते हो ।" शीत अातप बात बरिशण । "रात्रि का काम, पूरी रात काम करना ।" लोग एसा कर रहे हैं । शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे । पूरे दिन काम करो, फिर मुझे कुछ और अधिक पैसा मिल जाएगा, मैं तुम्हे रात में भी काम करने दूँगा, अतिरिक्त । इस तरह से हम काम कर रहे हैं । क्यों तुम काम कर रहे हो ? क्यों तुम काम कर रहे हो ?

शीत अातप बात बरिशण ए दिन जामिनी जागि रे, बिफले सेविनु कृपण दुरजन चपल सुख लभ लागि रे । "इस तरह से मैंने अपना समय बर्बाद किया है" बिफले सेविनु, "सेवा करना कृपण, दुरजन, कुछ तथाकथित समाज, दोस्ती और प्यार । कृपण, वे कभी नहीं, कभी नहीं, कृष्ण भावनामृत में लगेंगे, लेकिन मैं उनकी सेवा में लगा हूँ । " तो यह सामान्य है, एसा नहीं है कि हर, हर परिवार । अधिकतर ९९.९ प्रतिशत । तो बिफले सेविनु "इस तरह से मैं अपना समय बर्बाद कर रहा हूँ । और खुशी क्या है ?" चपल सुख लभ लागि रे ।"कुछ ही मिनटों का यौन जीवन, बस ।" यौन जीवन के पीछे, इतना सारा श्रम । इसलिए गोविंद दास कहते हैं "तुम धन का आनंद लेने की कोशिश कर रहे हो," ए-धन, यौवन, पुत्र, परिजन । भौतिक सुख का मतलब है कैसे पैसे, धन हासिल करना; और फिर जन, कई अनुयायि या आश्रित - पत्नी, बच्चे, दोस्त, समाज, इतनी सारी चीजें, देश ।

तो पुत्र, परिजन इथे कि अाछे परतीति रे । "तुम इस में कोई दिव्य आनंद नहीं पाअोगे ।" कमल-दल-जल, जीवन तलमल । यह जीवन ढुलमुल है । तुम नहीं कह सकते कि यह जीवन कब खत्म हो जाएगा । उदाहरण दिया गया है, कमल-जल-दल । जैसे कमल के पत्ते की तरह । अगर तुम पत्ते के उपर पानी डालते हो, यह नहीं रहेगा, यह गिर जाएगा । किसी भी क्षण में यह निकल जाता है । इसी तरह, हमारा जीवन ऐसा ही है, फिसल रहा है । किसी भी समय - समाप्त । कमल-जल-दल, जीवन... भजहु हरि-पद नीति रे । इसलिए कृष्ण भावनामृत में अपने आप को व्यस्त रखो जितना कर सकते हो । मौत आने से पहले खत्म करो । यह तुम्हारा लक्ष्य है । और कृष्ण भावनामृत क्या है? श्रवण, कीर्तन, स्मरण, वंदन, पाद सेवन ... पूजन, सखी-जन, आत्म-निवेदन, नौ प्रकार की भक्ति सेवा, गोविंद-दास-अभिलाश रे ।

तो हर किसी को गोविंद दास की तरह इच्छा करनी चाहिए । श्रवण कीर्तन, ये भक्ति के प्रक्रियाऍ हैं । सुनना, जप करना, स्मरण करना, अर्चन, अर्च विग्रह की पूजा करना, वंदन, प्रार्थना करना । नौ प्रकार के होते हैं । तो मानव जीवन इस उद्देश्य के लिए है, और ... इस प्रक्रिया के द्वारा, धीरे - धीरे हम कृष्ण भावनामृत की आग लगाते हैं, या आध्यात्मिक भावनामृत की । फिर उस आग से, जैसे धधकते आग द्वारा लकड़ी खुद राख बन जाती है, इसलिए हमारी, हमारा आवरण... आत्मा ढकी है पदार्थों से, अज्ञान से । तो यह आवरण और अज्ञान राख बन जाएगा, और तुम मुक्त हो जाते हो और घर वापस जाते हो, भगवद धाम । यह इस गीत का अभिप्राय है ।