HI/Prabhupada 0173 - हम हर व्यक्ति का मित्र बनना चाहते हैं



Lecture on SB 1.7.6 -- Vrndavana, April 23, 1975

तो हमें कृष्ण के विषय में भगवद्गीता या श्रीमद्भागवतम् से ज्ञान लेना है । कृष्णे परम पुरुषे भक्तिर् उत्पद्यते । अगर आप श्रीमद्भागवतम् सुनते हैं ... बेशक, अगर आपकी समझ में नहीं आता कृष्ण के मौलिक सिद्धांत क्या हैं या पूर्णता के मौलिक सिद्धांत... यह श्रीमद्भागवतम् के आरंभ में बताया गया है । धर्म: प्रौज्जहितः कैतव: अत्र परमो निर्मत्सराणाम् (श्रीमद भागवतम १.१.२) । यहाँ श्रीमद्भागवत में तथाकथित निर्मित धार्मिक प्रणाली को बाहर निकाल दिया जाता है। यह परमहंसों के लिए है । निर्मत्सराणाम् । निर्मत्सराणाम् का अर्थ है जो ईर्ष्या से रहित है । तो हमारी ईर्ष्या, हमारी ईर्ष्या कृष्ण से आरंभ हुई है । हम कृष्ण को स्वीकार नहीं करते । अधिकांश कहते हैं, "कृष्ण ही क्यों परम व्यक्ति होने चाहिए ? कई अन्य हैं ।" यही ईर्ष्या है । इसलिए हमारी ईर्ष्या कृष्ण से आरंभ हुई है, और इसलिए यह कई मायनों में विस्तारित हुई है । और हमारे सामान्य जीवन में हम ईर्ष्यालु हैं । हम हमारे दोस्तों से ईर्ष्यालु हैं, हमारे पिता से ईर्ष्यालु हैं, हमारे बेटे से भी, दूसरों के विषय में क्या कहें, व्यापारियों, राष्ट्र, समाज, समुदाय, केवल ईर्ष्या । मत्सरता । "उसे आगे क्यों जाना चाहिए ?" मैं ईर्ष्यालु हो जाता हूँ । यह भौतिक प्रकृति है ।

तो जब कोई कृष्ण को समझता है, वह कृष्णभावनामृत है, वह ईर्ष्या से मुक्त हो जाता है, ईर्ष्या नहीं रहती । वह मित्र बनना चाहता है । सुह्रद: सर्व-भूतानाम् (भ गी ५.२९)। तो इस कृष्णभावनामृत आंदोलन का अर्थ है हम हर किसी का मित्र बनना चाहते हैं । क्योंकि वे कृष्णभावनामृत के अभाव में पीड़ित हैं, हम दरवाज़े से दरवाज़े पर जा रहे हैं, शहर से शहर, गाँव से गाँव, नगर से नगर कृष्णभावनामृत का प्रचार करने के लिए । और कृष्ण की कृपा से हम पुरुषों के बुद्धिमान वर्ग का ध्यान आकर्षित कर रहे हैं। तो अगर हम यह प्रक्रिया ज़ारी रखते हैं, ईर्ष्यालु न बनने की... यह पशु प्रवृति है, कुत्ते की प्रवृति, सुअर की प्रवृति है । मानव प्रवृति होनी चाहिए पर दुःख दुःखी । किसी की दयनीय अवस्था को देखकर व्यक्ति को बहुत दुखी होना चाहिए । तो हर कोई कृष्णभावनामृत को पाने की लालसा मे पीड़ित है । हमारा एकमात्र कार्य है उनकी कृष्ण चेतना को जगाना, और पूरा संसार खुश हो जाएगा । अनर्थ उपाशमम् साक्षाद् भक्ति योगम् अधोक्षजे, लोकस्य अजानत: (श्रीमद् भागवतम् १.७.६) । लोगों को इसके विषय में ज्ञान नहीं है । इसलिए हमें इस आंदोलन को अागे बढ़ाना होगा । लोकस्याजान... विद्वामस् चक्रे सात्वत-संहिताम् (श्रीमद् भागवतम् १.७.६)। श्रीमद्भागवतम् । तो कृष्णभावनामृत आंदोलन का दूसरा नाम भागवत-धर्म है । भागवत-धर्म । अगर हम इसे स्वीकार करते हैं, तो पूरा मानव समाज प्रसन्न हो जाएगा । बहुत-बहुत धन्यवाद।