BN/Prabhupada 1074 - এই জড় আমরা জগতে যে সমস্ত দুঃখ দুর্দশা ভোগ করি - সব ই এই জড় শরীরের কারণে

From Vanipedia
Jump to: navigation, search
Go-previous.png Previous Page - Video 1073
Next Page - Video 1075 Go-next.png

এই জড় আমরা জগতে যে সমস্ত দুঃখ দুর্দশা ভোগ করি - সব ই এই জড় শরীরের কারণে
- Prabhupāda 1074


660219-20 - Lecture BG Introduction - New York

Hindi

इस संसार में जितने भी दुख का हम अनुभव करते हैं - ये सब शरीर से उत्पन्न है भगवद्- गीता में अन्यत्र यह कहा गया है कि

अव्यक्तो अक्षर इत्युक्तस्
तमाहु: परमां गतिम्
यं प्राप्य न निवर्तन्ते
तद्धाम परमं मम
(भ गी ८।२१)

अव्यक्त मतलब अप्रकट । हमारे समक्ष सारा भौतिक जगत तक प्रकट नहीं है । हमारी इन्द्रियॉ इतनी अपूर्ण हैं कि हम सारे नक्षत्रों को भी नहीं देख पाते, इस भौतिक जगत में कितने लोक हैं । निस्सन्देह, वैदिक साहित्य से हमें सभी लोकों के विषय में प्रचुर जानकारी प्राप्त होती है । हम विश्वास करें या विश्वास नहीं करें, सभी महत्वपूर्ण लोक जिनके साथ हमारा सम्बन्ध है, उनका वैदिक साहित्य में वर्णन हैं, विशेष रूप से श्रीमद्-भागवतम् में, लेकिन अाध्यात्मिक जगत, जो इस भौतिक आकाश से परे है, परसतस्मात्तु भावोन्यो (भ गी ८।२०) लेकिन वह अव्यक्त, वह अप्रकट आध्यात्मिक आकाश, परमां गतिम् है, अर्थ है, हमें कामना तथा लालसा करनी चाहिए भगवद्धाम को प्राप्त करने की । अौर जब किसी को उस धाम की प्राप्ति हो जाती है, यं प्राप्य, न निवर्तन्ते, उसे फिर से इस जगत में लौटता नहीं पडता है । और वह धाम भगवान का परम धाम है, जहॉ से हमें वापस न अाना पड़े, मतलब, यह होना चाहिए हमारा...अब एक प्रश्न पूछा जा सकता है, भगवद्धाम तक कैसे पहुंचा जाता है? वह भी भगवद्- गीता में वर्णित है । यह अाठवें अध्याय में वर्णित है, श्लोक ५,६,७,८, भगवान या भगवान के धाम तक पहुंचने की प्रक्रिया वहॉ भी वर्णित है । यह इस तरह कहा गया है:

अन्तकाले च मामेव
स्मरन्मुक्त्वा कलेवरम
य: प्रयाति स मद भावमं
याति नास्त्यत्र संशय:
(भ गी ८।५)

अन्त-काले, जीवन के अंत में, मृत्यु के समय । अन्त-काले च मामेव । जो व्यक्ति श्री कृष्ण का चिंतन करता है, स्मरण, अगर वह याद कर सकता है । एक मरता हुए व्यक्ति, मृत्यु के समय, अगर वह श्री कृष्ण के स्वरूप का चिंतन करता है और यदि इस रूप का चिंतन करते हुए, अगर वह मर जाता है, तो निश्चित रूप से वह आध्यात्मिक धाम को प्राप्त होता है, मद भावं । भावं का अर्थ है परम स्वभाव । य: प्रयाति स मद भावं याति । मद- भावं शब्द परम पुरुष के परम स्वभाव का सूचक है । जैसा कि हमने पहले उल्लेख किया है, कि परम पुरुष सच्चिदानन्द विग्रह हैं (ब्र स ५।१) । उनका अपना स्वरूप है, लकिन उनका स्वरूप शाश्वत है, सत ; और ज्ञान से पूर्ण, चित ; और आनंद से पूर्ण, अानंद । अब अगर हम वर्तमान शरीर से तुलना करते हैं, कि क्या यह शरीर सच्चिदानन्द है । नहीं । यह शरीर असत है । यह सत नहीं अपितु असत है । अंतवंत इमे देहा (भ गी २।१८) , भगवद्- गीता का कथन है, कि यह शरीर अंतवत है, नाश्वान । और ... सच चिद अानंद । यह सत नहीं अपितु असत है, बिल्कुल विपरीत । और चित नहीं, ज्ञान से पूर्ण, यह अज्ञान से पूर्ण है । हमें भगवद्धाम का ज्ञान नहीं है, न तो हमें इस भौतिक जगत का पूर्ण ज्ञान है । एसी कई चीजें है जो हमें ज्ञात नहीं है, अतएव यह शरीर अनभिज्ञ है । ज्ञान से पूर्ण होने के बजाय यह अनभिज्ञ है । शरीर नाश्वान है, अज्ञान से पूर्ण, और निरानंद । आनंद से अोतप्रोत न होकर, यह दुखमय है । हमें इस भौतिक दुनिया में जितने भी दुखों का अनुभव होता है, वे शरीर से उत्पन्न हैं ।

Bengali

ভগবদ গীতায় অন্যত্র বলা হয়েছে যে, অব্যক্ত ক্ষর ইতি উক্তস তম আহ: পরমাম গতিম যম প্রাপ্য ন নিবর্তন্তে তদ ধাম পরমম মম (ভগবদ গীতা ৮.২১) অব্যক্ত মানে অপ্রকাশিত . এমনকি জড় জগতের পুরো অংশ ও আমাদের নিকট প্রকাশিত নয়। আমাদের ইন্দ্রিয় গুলো এত অপূর্ণ যে, আমরা দেখতে পারি না কতগুলি গ্রহ নক্ষত্র রয়েছে, এই জড় বিশ্ব ব্রম্মান্ডে। অবশ্যই , বৈদিক সাহিত্যের মাধ্যমে আমরা সব গ্রহ নক্ষত্রের তথ্য পাই। আমরা বিশ্বাস করতেও পারি, না ও পারি, কিন্ত সকল গুরুত্বপূর্ণ গ্রহগুলিতে, যেখানে আমাদের যোগাযোগ রয়েছে, সেগুলো সম্পর্কে বৈদিক সাহিত্যে বর্ণনা রয়েছে, বিশেষ করে শ্রীমদভাগবতে। কিন্ত চিজ্জগত, যা এই জড় জগতের অতীত , পরশ তস্মাত তু ভাবন্য ( ভাগবদ গীতা ৮.২০) কিন্ত সেই অব্যক্ত, অপ্রকাশিত চিদাকাশ, হচ্ছে পরমাম গতিম , তার মানে, প্রত্যেককেই সেই সনাতন ধাম প্রাপ্তির জন্য লালায়িত হতে হবে। এবং একবার সেই ধামে গেলে, যম প্রাপ্য, কেউ সেই ধাম প্রাপ্তির পথে অগ্রসর হোক বা ধাম প্রাপ্তি হোক, ন নিবর্তন্তে , তাহলে আর এই জগতে ফিরে আসতে হবে না। এবং সেই ধাম যা ভগবানের সনাতন আবাস , যেখান থেকে আমাদের আর ফিরে আসতে হবে না, সেটা আমাদের, আমাদের ( বিরতি ..) এখন প্রশ্ন হলো, কিভাবে ভগবানের সেই ধামে যাওয়া যায় ? সেটাও ভগবদ গীতায় বর্ণনা করা হয়েছে। অষ্টম অধ্যায়ে , শ্লোক ৫, ৬, ৭, ৮ বর্ণনা করা হয়েছে, কিভাবে ভগবান অথবা ভগবদ্ধামে অগ্রসর হওয়া যায়। এইভাবে বলা হয়েছে যে, অন্ত কালে চ মামেব স্মরন্মুক্ত কলেবরম , যঃ প্রয়াতি স মদ ভাবম যাতি নাস্তি অত্র সংশয়ঃ (ভগবদ গীতা ৮.৫) অন্ত কালে, জীবনের শেষ সময়ে, মৃত্য সময়ে. অন্ত কালে চ মাম এব. যে কৃষ্ণ চিন্তা করে , কৃষ্ণ স্মরণ, যদি কেউ করতে পারে, মৃত্যু পথযাত্রী, মৃত্যর সময়ে, যদি সে কৃষ্ণের রূপ চিন্তা করে, এবং এইভাবে স্মরণ সময়ে যদি কেউ দেহত্যাগ করে, তাহলে, সে অবশ্যই চিজ্জগতে প্রবেশ করবে, মদ ভাবম। ভাবম মানে চিন্ময় প্রকৃতি। যঃ প্রয়াতি স মদ ভাবম যাতি . মদ ভাবম মানে পরম পুরুষোত্তম ভগবানের চিন্ময় প্রকৃতি। যেমনটি উপরে বর্ণনা করা হয়েছে যে, পরম পুরুষোত্তম ভগবান সচ্চিদানন্দ বিগ্রহ (ব্রম্ম সংহিতা ৫.১) তার রূপ রয়েছে, কিন্ত সেই রূপ নিত্য, সত্ , এবং পূর্ণ জ্ঞান , চিত , এবং পূর্ণ আনন্দ, আনন্দ। এখন যেমন আমরা আমাদের শরীরের সাথে তুলনা করতে পারি, আমাদের শরীরটি সচ্চিদানন্দ কি না। না, এই শরীরটি অসত, সত নয়, এটা অসত। অন্তবন্ত ইমে দেহা (ভগবদ গীতা ২.১৮) , ভগবদ গীতায় বলা হয়েছে, এই শরীরটি নশ্বর। এবং.... সচ্চিদানন্দ। সত হওয়ার পরিবর্তে এটা অসত, ঠিক বিপরীত। এবং চিত, পূর্ণ জ্ঞানী হওয়ার পরিবর্তে এটা অজ্ঞানে পরিপূর্ণ। চিজ্জগত সম্পর্কে আমাদের কোনো ধারনাই নেই। এমনকি এই জড় জগত সম্পর্কেও আমাদের নিখুঁত জ্ঞান নেই। অনেক কিছুই অজানা , তাই এই শরীর টি অজ্ঞতায় পূর্ণ। পূর্ণ জ্ঞানী হওয়ার পরিবর্তে এটা অজ্ঞ। শরীর টি নশ্বর, অজ্ঞতায় পূর্ণ এবং নিরানন্দ। পূর্ণ আনন্দের পরিবর্তে এটা দুঃখ দুর্দশায় পূর্ণ। এই জড় জগতে যা দুঃখ দুর্দশা আমরা ভোগ করি, তা সব ই এই শরীর তার জন্য।